मेड ने भी आज पूछ ही लिया कि,”दीदी ये बाल क्यों नहीं धो रहीं आप। देखो तो कैसे दिखने लगे हैं।” ऑफिस में भी आज आशु ने टोका कि, “क्या हाल बना रखा है। ऐसी तेलकट बनीं क्यों घूम रही हों?”

अब कैसे उनको समझाऊँ कि बालों में तुम्हारी आखिरी छुअन है। तुमने जाते वक़्त उनको समेटते हुए माथे को चूमा था। उस चूमने के दरमियाँ तुम्हारे उपरवाले होंठों का एक टुकड़ा उन बालों में रह गया। अब धो लुंगी तो मेरा वो टुकड़ा भी धुल जायेगा। अभी तो जब कभी बालों को खोलती हूँ तो उनमें से तुम्हारी सांसों की महक आती हैं वो महक भी खो जाएगी।

देखो तो कितना मुश्किल है तुम्हें सहेजना। देर रात जोर से हवा चली और हल्की बारिश भी हुई। सुबह चाय का कप ले कर वहां खिड़की के पास गयी जहाँ जाने से पहले उस रात को तुमने आख़िरी सिगरेट को बुझाया था खिड़की के किनारे से रगड़ कर, वहाँ से वो सिगरेट का टुकड़ा न जाने से कैसे गिड़ गया। अब सिर्फ थोड़ी सी राख़ बची है। सोचा कि उठा कर रख लूँ किसी छोटे से डिब्बे में मगर फिर उस खिड़की के पास बैठना बेमानी हो जायेगा। अभी तो उस खिड़की पर तुम्हारे होने के निशाँ तो हैं।

उस दिन कुछ कर रही थी और मेड ने वो बेडशीट उठा कर लगभग मशीन में डाल ही दिया था कि मैंने खींच कर वापस ले लिया। रात को उस से लिपट कर सोती हूँ तो तुम से लिपटने का अहसास होता है। उस बेडशीट से अब भी वही खुशबु आती है, जैसी तुम्हारे कानों के पीछे से आती है।

ऐ सुनों तुम कैसे वहाँ रह लेते हो मेरे बिना? ये बेतरह सिर्फ मुझे ही क्यों याद आते हो? ये बेक़रारी सिर्फ मुझे ही क्यों होती है? बोलो न तुम भी कुछ। ये कैसी दुश्मनी निबाह रहे हो मुझसे!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here