नमस्कार दोस्तों आप सभी लोगों का हमारे लेख में स्वागत है दोस्तों आपने महाभारत की कथा तो सुनी ही होगी महाभारत में एक से एक योद्धा रहे थे और इन्हीं योद्धाओं में से वीर और बहादुर कर्ण भी थे कर्ण ने यह युद्ध कौरवों की तरफ से लड़ा था इसके बावजूद भी यह श्री कृष्ण जी के बहुत प्रिय थे क्योंकि उसका हृदय पवित्र और साफ था इसके साथ ही कर्ण अच्छे गुणों वाला इंसान था कर्ण एक अच्छा इंसान तो था ही इसके साथ निडर योद्धा भी था तीरंदाजी में इनका मुकाबला कोई भी नहीं कर सकता था कर्ण ने अपने बचपन से ही बहुत से दुखों का सामना किया है यह दुर्योधन के सबसे अच्छे मित्र भी थे इसी वजह से उन्होंने महाभारत का युद्ध पांडवों के विरुद्ध लड़ा था और आप इस बात को तो जानते ही हैं कि कर्ण को बहुत बड़ा दानी कहा गया है ऐसा कहा जाता है कि उनसे कुछ भी मांग लो वह कभी किसी चीज के लिए मना नहीं कर सकते चाहे उनको अपने प्राणों की बाजी क्यों न लगाना पड़े।

आज हम आपको इस लेख के माध्यम से कर्ण के जीवन से जुड़ी हुई कुछ जानकारियां बताने वाले हैं और इसके साथ ही उन तीन वचनों के विषय में जानकारी देंगे जो श्री कृष्ण जी ने कर्ण के अंतिम समय में उनको दिया था।

कुंती पांडवों की माता के साथ-साथ कर्ण की भी माता थी कर्ण का जन्म कुंती और पांडु के विवाह के पहले ही हुआ था सूर्य देवता के आशीर्वाद से ही कुंती ने कर्ण को जन्म दिया था इन्हीं कारणों से कर्ण को सूर्य पुत्र कहा जाता है सूर्य देव ने अपने पुत्र को एक कवच भी प्रदान किया था जिसकी वजह से कोई भी इनको पराजित नहीं कर सकता था आज के समय में भी कर्ण एक महान योद्धा के रूप में जाने जाते हैं यह अपने पूरे जीवन भर प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते रहे जिसके यह हकदार थे वह इनको कुछ भी नहीं मिल पाया।

ऐसा कहा जाता है कि कर्ण रोजाना नियमित रूप से सूर्य देवता को जल अर्पित किया करते थे उन्होंने किसी भी परिस्थितियों में अपना यह नियम नहीं तोड़ा था और उस दौरान उनसे कुछ भी मांग लिया जाए वह कभी मना नहीं करते थे कर्ण और अर्जुन दोनों ही बहुत शक्तिशाली और वीर पुरुष थे कर्ण के पास उनके पिता का दिया हुआ कवच था इसलिए वह अर्जुन से अधिक शक्तिशाली माने गए थे दूसरी तरफ इंद्र देवता भी इस बात से बहुत अधिक परेशान थे कि कर्ण के पास यह कवच है तो उन्होंने निर्णय किया कि जब वह सूर्य देवता को जल अर्पित करेंगे तब दान के रूप में उनका वह कवच मांग लेंगे जब सूर्य देवता को इस बात की भनक लगी तो उन्होंने फौरन ही कर्ण को चेतावनी दे दी और जल अर्पित करने से भी मना कर दिया परंतु कर्ण ने उनकी एक भी ना सुनी और उन्होंने यह बात कही कि मैं सिर्फ दान के भय से अपने पिता की उपासना नहीं छोड़ सकता हूं।

जब सूर्य देवता ने उनको मना किया परंतु वह नहीं माने तो अगली सुबह वह सूर्य देवता को जल अर्पित करने के लिए नदी के तट पर पहुंच गए जहां पर इंद्रदेव एक ब्राह्मण के रूप में पहले से ही उनका इंतजार कर रहे थे जैसे ही वह सूर्यदेव की पूजा समाप्त करके उठे इंद्रदेव उनके पास गए और दान में उनका कवच मांग लिया और उन्होंने खुशी खुशी से अपना वह कवच इंद्रदेव को दे दिया इंद्रदेव उनकी इस बात से प्रसन्न होकर एक अस्त्र भी दिया जिसका प्रयोग वह अपनी रक्षा के लिए कर सकते थे ऐसा कहा जाता है कि इंद्रदेव को दान में अपना कवच देना ही युद्ध में अर्जुन के हाथों कर्ण की सबसे बड़ी हार है इसके अतिरिक्त इंद्रदेव के द्वारा दिए हुए अस्त्र का प्रयोग भी कर्ण ने युद्ध से पहले ही कर लिया था उनकी अच्छाई और अच्छे कर्म की वजह से ही कर्ण श्री कृष्ण के बहुत ही नजदीक है।

श्री कृष्ण ने दिए थे कर्ण को तीन वचन

  • श्री कृष्ण से पहले वचन में करण ने जात पात का भेद भाव समाप्त करने के लिए कहा था ताकि सबको एक बराबर का दर्जा दिया जा सके।
  • अपने दूसरे वचन में कर्ण ने श्री कृष्ण से कहा कि जब भी वह अपना अगला अवतार लेकर धरती पर आए तो वह उसके राज्य में ही जन्म ले।
  • अपने अंतिम और तीसरे वचन में कर्ण ने श्री कृष्ण से कहा कि उसका दाह संस्कार ऐसे स्थान पर किया जाए जो पवित्र हो और सभी पापों से छुटकारा मिले जहां कभी कुछ गलत ना हुआ हो।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here