दीपावली का समय है और हर तरफ सफाई, खरीदारी और घर को सजाने का काम हो रहा है. हिंदू धर्म से जु़ड़े हर व्यक्ति को पता है कि श्रीराम ने किस तरह से सीता माता से शादी की थी. सीताजी का स्वयंवर हुआ था जिसमें कई राज्य के एक से बढ़कर एक योद्धा शामिल हुए मगर सीता माता श्रीराम की ही हुईं. शिवजी से प्राप्त उस धनुष का रहस्य बहुत गहरा है जिसे हर किसी को जानना चाहिए. क्योंकि दीपावली के दिन श्रीराम सीता माता को लेकर वनवास पूरा करके वापस आए थे और इसी दिन को लोग दीपावली के त्यौहार के रूप में मनाते हैं. यह सब नहीं होता अगर श्रीराम ने शिव जी के धनुष को नहीं तोड़ा होता और सीता जी के पिता जनक को आभास नहीं होता कि श्रीराम ही सीता माता के लायक हैं. मगर जिस धनुष को तोड़कर श्रीराम ने सीता से किया था विवाह, उस धनुष के बारे में चर्चा कम होती है और आज हम आपको उसी बारे में बताएंगे.

जिस धनुष को तोड़कर श्रीराम ने सीता से किया था विवाह

सीता माता के स्वंयवर में उनके पिता राजा जनक ने यह शर्त रखी थी कि जो भी इस धनुष को तोड़ेगा वह ही सीता को वरने में समर्थ होगा. सभा में बहुत से वीर राजा आए और उन्होंने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया लेकिन वह धनुष टस से मस नहीं हुआ. यह वही धनुष था जिसे सीता माता ने बचपन में अपने एक हाथ से उठा लिया था और इस दृश्य को राजा जनक छिपकर देख रहे थे. उन्होंने तभी निश्चय कर लिया था कि सीता जी का विवाह ऐसे पुरुष से होगा जो उस धनुष को ना सिर्फ उठा सके बल्कि उसे तोड़ भी दे. श्रीराम ने जनक की शर्तानुसार धनुष तोड़ दिया और सीता माता को पत्नी के रूप में प्राप्त कर लिया था. श्रीराम ने जो धनुष तोड़ा था वो जनक ने भवगवान शिव से प्राप्त किया था.

जिस समय जनक सीता माता को छिपकर देख रहे थे तभी उन्हें ज्ञात हो गया था कि सीता माता कोई सामान्य कन्या नहीं हैं और उनका विवाह भी किसी सामान्य व्यक्ति के साथ तो नहीं होना चाहिए. जनक जी ने उसी समय तय कर लिया था कि देवी सीता का विवाह उसी पुरुष से होगा जो शिव जी के धनुष को प्रत्यंचा पर चढ़ा सकेगा.

इस तरह जनक ने पाया था वह धनुष

शिव दी ने जनक जी को धनुष के विषय में बताया कि यह धनुष जनक जी को भगवान महादेव ने दिया था. इन्हें अजगबीनाथ नाम से जाना जाता था और इनका मंदिर बिहार के सुल्तानपुर में स्थित था. ऐसी मान्यता है कि इसी जगह पर भगवान ने शिव ने राजा जनक को धनुष दिया था. अजगबीनाथ महादेव के बारे में ऐसी मान्यता है कि यह बैद्यनाथ की कचहरी है और यहां भक्त अपनी समस्याएं बाबा के पास दर्ज करवाते हैं और इसकी सुनवाई देवघर में होती है.

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