तुलसीदास : तुलसीदास रामचरित मानस लिखने के बाद उसका विमोचन करवाने के लिए अपने वरिष्ठ लेखक वाल्मीकि और कालीदास की कुटिया पर रोज चक्कर लगाते, काफी मिन्नतों के बाद वरिष्ठ लेखक वाल्मीकि जी उनकी किताब राम चरित मानस का विमोचन करते। तथा कालीदास ‘अयोध्या टाइम्स’ में उसकी समीक्षा में लिखते. कि नई हिंदी वाले नवोदित लेखक ‘तुलसीदास दुबे’ की किताब पढ़ी. इंटरटेन करने के लिहाज से तो ठीक है. पर अगर बात भाषा और साहित्य की करें तो इस नई हिंदी वाले लेखक ‘टीडी दुबे’ ने हिंदी भाषा को बर्बाद करने में कोई कसर नही छोड़ी है. शब्द चयन भी इसमें बहुत औसत दर्जे का है. नई हिंदी के नाम पर इन्होंने ‘लक्ष्मण’ को ‘लषन’ लिख के उसे नई हिंदी ‘अवधी’ का नाम देकर जो रायता फैलाया. आने वाले समय में मुझे इस बात का बहुत बड़ा भय है कि ये अवधी हमारे राष्ट्रभाषा हिंदी को खा जाएगी. मुझे समझ नही आता है कि ये भाषा आने वाली पीढ़ी की क्या भला करेगी?

कबीरदास : कबीर दास आज के समय में होते तो उनके साथ दो काम होते. एक तो खिलेआम लोगों के धर्म और उनके ईश्वर/अल्लाह पर कटाक्ष करने ने चलते में हिन्दू महासभा और मुस्लिम सङ्गठन वालों के हाथों कई बार कुट चुके होते। और दूसरा अनपढ़ होने के चलते उनके दोहे लिखने वाला उनका चेला सारे दोहे अपने नाम से छपवा के नामधारी लेखक बन गया होता। यही हाल सूरदास का भी होता उनके दोहे और सवैय्या किसी मोहनलाल के नाम से फेसबुक पर वायरल हो रहे होते।

मुंशी प्रेमचंद : हिंदी गद्य के महान लेखक और उपन्यास सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद अगर आज के समय में होते तो वो इतने सारे उपन्यास, किताबें लिख ही नहीं पाते. अपना पहला उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ लिखने के बाद उसे छपवाने के लिए प्रकाशन को २५ हजार रूपये देने की जद्दोजहद में किसी दोयम दर्जे के अखबार में कॉलम लिखने की नौकरी करके चीफ एडिटर के हाथों खुद का शोषण करवा रहे होते. इसके बाद भी अगर उपन्यास छप भी जाती तो बाकी की आधी जिंदगी सेल्स मैन बनकर उसे बेचने में गंवा देते।

हरिशंकर परसाई : सबसे ज्यादा आफत अगर किसी बन्दे के साथ होती तो थे अपने परसाई जी। परसाई जी आज के दौर में होते तो मौजूदा सरकार पर व्यंग्य करने के चलते चार बार हवालात जा चुके होते. उनके घर कम से कम दस बार सीबीआई की रेड पड़ चुकी होती. सोशल मीडिया पर ट्रोल्स से रोज हजारों गालियां खाते. व्यंग्य सम्राट की उपाधि पाने वाले परसाई जी आज के दौर में होते दल्ला, बिकाऊ, भांड, वामपंथी, पाकिस्तानी, देशद्रोही जैसे उपाधियों से विभूषित हो चुके होते।

रामधारी सिंह दिनकर सरकार को टॉरगेट करती कविताएँ लिखने के चक्कर में ट्वीटर फेसबुक पर ट्रोल्स के निशाने पर होते. जयशंकर प्रसाद अपनी छायावादी कविताओं और इतनी शादियां और प्रेम करने के चलते ठरकी कहे जा रहे होते. महादेवी वर्मा फूलपत्ती गैंग की सरदार होतीं. अमृता प्रीतम फेमिनिस्ट ग्रूप की एडमिन। मंटो की कहानियां सरस सलिल में छप रही होतीं तो मैथिली शरण गुप्त राज्यसभा सदस्य होने के बाद लिखना बन्द करके फुल टाइम राजनीती में आ चुके होते और टीवी डिबेट में अपोजिशन पार्टी वाले बन्दे से तू-तू मैं-मैं कर रहे होते !!

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