मैं चाहता हूँ कि मैं बन जाऊ

किसी बाँझ की उल्टी
विधवा की साड़ी पर रंग
उस बूढ़े बाप के जीने की आश
जिसका इकलौता जवान बेटा मर गया तपेदिक के रोग से.

वो एक नैनो सेकेंड जिससे पिछड़ के
उसेन बोल्ड अपने आखिरी रेस में नहीं बन सके नम्बर वन.
वो एक मार्क जिसकी कमी से फेल होकर
ख़ुदकुशी कर ली उन्नीस साल के उस गोरे से लड़के ने
जिसके मिडिल क्लास बाप की सारी कमाई जाती थी उसकी पढ़ाई में.

मैं चाहता हूँ कि मैं बन जाऊं
बुखार से तप रहे उस अकेले बन्दे के लिए एक कप काढ़ा
जिसमें उठ के स्टोव जलाने की ताकत न थी.
और प्यार में टूटे उस लड़के की हिम्मत
जिसे आने लगे थे ख़ुदकुशी करने के वाहियात से ख्याल.

बनना चाहता हूँ सड़क किनारे सब्जी बेचने वाली
उस बूढी औरत का वो ग्राहक
जिसके इंतजार में वो कब से बैठी थी
कि जिसे सब्जी बेचकर वो शाम को घर का चूल्हा जला सके.

मैं चाहता हूँ मैं बन जाऊं वो मोती
जो कारगिल जंग के बाद सही सलामत घर लौटे फौजी बेटे को देख के उसकी माँ
पहाड़ काट के रास्ता बना देने के बाद बीवी को याद करके दशरथ मांझी
और तीसरे दोहरे शतक के बाद रोहित की बीवी की आँखों में उतर आया था.

और भी बहुत कुछ बनना चाहता हूँ
जैसे उस बबूल के पेड़ पर टँगे घोसले में बैठे भूखे बया के नन्हे बच्चों
सरपंच की भूसवारी में जन्में भूरी कुतिया के चारों पिल्लों
और खूंटे पर बंधे गाय के बछड़े की वो आश.. कि माँ आती होगी।

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