धनतेरस का त्यौहार बेहद ही नजदीक है औऱ इस दिन खरीददारी करना बेहद ही शुभ माना गया है। ऐसा कहते हैं कि इन दिन की गई खरीददारी का सामान हमेशा शुभ फल देता है। हालांकि इस दिन से ही दिए निकालने की प्रथा शुरु हो जाती है, लेकिन इस दिन सिर्फ भगवान धनवंतरी के लिए ही दिया नहीं निकलता है। धनतेरस के दिन मृत्यु के देवता यमराज के लिए भी दीपदान किया जाता है।

धनेतरस को नरक चतुर्दशी भी कहते हैं। साथ ही इसे छोटी दीवाली भी कहते हैं। स्कंदपुराण में धनतेरस या नरक चतुर्दशी का उल्लेख मिलता है।

कार्तिकास्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे।

यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युविनिश्यति।।

इसका अर्थ है कि कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी के दिन सायंकल में यानी शाम के समय घर के बाहर यमदेव के उंद्देश्य से दीप रखने से अकाल मृत्यु का निवारण होता है।

कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां तु पावके

यमदीपं बहिर्दद्यादमृत्युर्विनश्यति

इसका अर्थ है कि कार्तिक कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को घर से बाहर यमराज के लिए दीप देना चाहिए। इससे दुर मृत्यु का नाश होता है।

क्या है कहानी

नरक चतुर्दशी या यमराज को दीपदान करने के पीछे एक कहानी है। यमराज के साथ प्राण हरने के लिए उनके यमदुत भी जाते हैं। एक बार यमराज ने पूछा कि क्या तुम्हें प्राणियों के प्राण हरते समय दयाभाल आया।

यमदूतों ने संकोचते हुए कहा- नहीं महाराज। यमराज ने दोबारा पूछा तो उन्होंने बताया कि एक बार ऐसा कुछ हुआ था कि हम घबरा गए थे। यमदूतों ने बताया कि हेम नाम के राजा की पत्नी क एक पुत्र पैदा हुआ। ज्योतिषों ने बालक के ग्रह नक्षत्र देखे तो कहा कि जब भी यह बालक विवाह करेगा तो चौथे दिन उसकी मृत्यु हो जाएगी।

पंडितों की बात सुनकर माता पिता घबरा गए। उन्होंने बालक को यमुना के तट पर एक गुफा में ब्रह्मचारी के रुप में रखा औऱ वहीं उसका पालन पोषण करने लगे।हालांकि नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन महाराजा हंस की बेटी यमुना के तट पर घूम रही तो ब्रह्मचारी युवक उस पर अपना दिल हार गया।

दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया। जैसा की ज्योतिषों ने बताया था कि विवाह के चौथे दिन उसकी मृत्यु हो जाएगी वैसा ही हुआ। शादी के चौथे दिन उस बालक की मृत्य हो गई। अपनी पति का मृत्यु देखकर उसकी पत्नी बदहवास होकेर रोने लगी। उसक करुण विलाप सुनकर हमारा ह्दय भी कांप उठा।

यमदूत ने कहा कि उस राजकुमार के प्राण हरते वक्त हमारे भी आसुं नहीं रुक रहे थे। इसके बाद एक यमदूत ने पूछा कि महाराज क्या अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है। इस पर यमराज ने उन्हें बताया कि एक उपाय है।

यमराज ने कहा कि अकाल मृत्यु से मुक्ति पाने के लिए जो व्यक्ति धनतेरस के दिन पूजा औऱ दीपदान विधिपूर्व करेगा उसे कभी अकाल मृत्यु का भय नहीं सताएगा। जहां यह पूजन होता है वहां अकाल मृत्यु का डर नहीं रहता। इसके बाद से ही धनतेरस के दिन से यमराज के पूजन के बाद दीपदान की परंपरा प्रचलित हुई।

कैसे करें दीपदान

धनतेरस की शाम को मुख्य द्वार पर 13 और घर के अंदर 13 दीप जलाने होते है। हालांकि जो यम का दिया जलता है वह परिवार के सभी सदस्यों के घर आने और खा पीकर सोने के बाद किसी एक व्यक्ति द्वारा जलाया जाता है।

इस दीप को जलाने के लिए पुराने दीप का इस्तेमाल करना चाहिए। उसमें सरसों का तेल डालें और रुई की बत्ती बना लें। घर से दीप जलाते हुए उसे दक्षिण की ओर मुख कर नाली या कुड़े के ढेर के पास रख दें। साथ में जल भी चढ़ाएं और उस दीप को देखे बिना घर में आ जाए।

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