कहते हैं इंसान को अपना जीवन सरल बनाने के लिए बहुत कड़े संघर्षों का सामना करना पड़ता है। कड़े संघर्षों के बाद ही किसी इंसान को जीवन में सफलता प्राप्त होती है। लेकिन कभी-कभी यह संघर्ष जीवन भर के के के हो जाते हैं और इंसान भीतर-ही-भीतर टूट टूट जाता है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे इंसान के बारे में बताने वाले हैं जिसने अपने जीवन के अधिकार को पाने के लिए 29 साल तक संघर्ष किया और 29 साल साल बाद उसने सफलता को पाया। यह संघर्ष की कहानी सच्ची है है है और ग्वालियर के पिंटो पार्क निवासी बेताल माहौर की है। बेताल माहोर ने 1989 में जेल प्रहरी की नौकरी के लिए आवेदन भरा था, उस समय वह 34 वर्ष के थे। उस समय फिजिकल पास करने के बाद मेरिट सूची में डायरेक्ट नाम आ जाता था जाता था आ जाता था आ जाता था आ जाता था और सीधी भर्ती हुआ करती थी। लेकिन उस दौरान उनके साथ विभाग द्वारा बहुत अन्याय किया गया, आइए जानते हैं उनकी संघर्ष की कहानी।

बेताल माहौर ने जेल प्रभारी के आवेदन के दौरान 12 स्थान प्राप्त किया लेकिन विभाग द्वारा उन्हें यह कह कर टाल दिया गया कि टाल दिया गया कि नौकरी के 11 ही पद खाली है। फिर एक माह बाद जब दूसरी वर्क की भर्ती निकली तब पुरानी सूची में से ही लोगों का चयन कर लिया गया और उस समय भी बेताल माहौर को नहीं चुना गया। नौकरी से वंचित वेताल में इस बात को लेकर पुलिस विभाग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपनी लड़ाई लड़ी और संघर्ष किया। सुप्रीम कोर्ट में सबूत ना होने के कारण उनकी याचिका खारिज कर दी गई, लेकिन उन्होंने तब भी हार नहीं मानी और आरटीआई का सहारा लिया। उन्होंने अपनी लड़ाई लड़ी और अंत में उन्हें मध्य प्रदेश राज्य अनुसूचित जाति द्वारा 50 लाख रुपए का मुआवजा देने की बात कही गई।

आरटीआई में अपनी याचिका दर्ज कराने के बाद बेताल ने उनसे 2012 की परीक्षा के रिकार्ड्स मांगे, जिनसे यह साबित हो गया कि बेताल उस समय जेल प्रभारी की नौकरी के लिए योग्य थे, लेकिन अब उम्र ज्यादा होने की वजह से उन्हें यह नौकरी नहीं दी जा सकती है। 2007 तक आरटीआई एक्ट चर्चा में आ गया था इसलिए बेताल ने आरटीआई का सहारा लेना ही ठीक समझा।आरटीआई के जरिए उन्हें सारे सबूत मिले और उन्होंने खुद को सही साबित कर लिया।

साल 2017 में बेताल ने अनुसूचित जनजाति आयोग में अपनी गुहार लगाई और उन्हें सारा मांजरा बताया। उनकी सारी दलीलों और सबूतों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कहा कि यह उस वक्त पद के लायक थे, और उन्हें फिर भी यह पद नहीं दिया गया, अब उन्हें इस चीज का का हर्जाना देते हुए 50,लाख रुपए देने का निर्णय लिया।

बेताल ने खुद पर बीती से परेशान होकर निर्णय ले लिया था कि मरने से पहले अपना हक लिए बिना मैं केस लड़ना नहीं छोडूंगा। 29 साल तक उन्होंने लगातार अपने ऊपर हुए अन्याय के खिलाफ प्रशासन से केस लड़ा और आखिरकार उसमें जीत हासिल कर ही ली। मध्यप्रदेश शासन से उन्हें 50 लाख का मुआवजा देने की बात तो कह दी गई है, लेकिन उस बात को अब डेढ़ महीना हो चुका है। अब तक उन्हें मुआवजे की रकम के बारे में कुछ सूचना तक नहीं दी गई है देना तो दूर की बात है। लेकिन उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद मैं थका नहीं हूं अभी हाई कोर्ट में अपना केस दायर करूंगा और जीतूंगा भी।

उनका कहना है कि हमारे हिसाब से आयोग का फैसला बिल्कुल भी ठीक नहीं है। मैं उस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देना चाहते हैं और चाहते हैं कि अपनी सच्ची जीत हासिल जरूर करे।

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