तय वक़्त था उसके कॉल का। हर दिन रात नौ से सवा नौ के बीच उसका फ़ोन आता था। उसके पहले वो सब कुछ निपटा लेना चाहती थी। वो सारे काम जिसे वो दिन भर टालती रहती उसके कॉल के आने से पहले पूरा कर लेती थी। वह एक फ़ोन-कॉल उसका ब्राउनी-point होता था। पूरे दिन की थकान, बोझ, उदासी बस उसकी आवाज़ को सुन कर ग़ायब हो जाती थी।

स्क्रीन पर उसका नाम देखना ही इसकी आँखों में चमक भर देता था। कई बार उसके नाम के साथ उसका फ़ोटो भी add कर देती थी contact में, तो मुस्कुराता हुआ कॉल आता था उसका।

उसके कॉल के तीन हिस्से होते थे। पहला जिसमें वो अपने दिन के बारे में बताता। दूसरे में ये अपनी शिकायतें सुनाती। कभी ज़िंदगी से जुड़ी शिकायतें होती तो कभी उससे उसकी ही शिकायत होती। वो शिकायतों को सुन कभी चुप हो जाता तो कभी समझा देता। उसकी बातें किसी छोटे बच्चे की तरह चुप-चाप सुन लेती कभी तो कभी ज़िद्द में आते हुए ज़ोर से ‘नहीं’ बोल देती। मानों उसकी बात को नहीं दुनिया को, अपने वजूद को झूठला देना चाहती हो।

और आख़िर का हिस्सा जिसमें में वो फ़ोन रखने की बात करता था। उसके साँस लेने के अन्दाज़ से समझ जाती की अब वो फ़ोन रखेगा। जो अब बोलेगा वो आज की आख़िरी बात होगी।

हर बार उसका फ़ोन रखना उसे दुःख से भर देता था। हर बार कुछ टूटता था भीतर उसके।फ़ोन रख कर वो घर चला जाता था अपने। जहाँ वो नहीं रहती थी। जहाँ उसका कोई वजूद नहीं होता था,

…. वहाँ कोई और रहती थी।

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