जब बेटे को बताया कि ट्रेन से उन्हें बनारस जाना है तो उसने और बहु ने भी साफ़-साफ़ मना कर दिया। माँ की तबियत को लेकर पहले से ही घर में सब परेशान थे और ये उनको ट्रेन से ले कर घूमने जाना चाहते थे। कैसे कोई हाँ करता.?

मगर ज़िद्द करने लगे। बोले की तुम टिकिट नहीं कटवा दोगे तो कल जाकर हम ख़ुद ही कटवा ले आएंगे। बच्चे जानते थे अपने बाप को। नहीं चाहते हुए भी दो टिकटें बुक करवा दी गयीं अगले सप्ताह की। होटल वगरैह भी ऑनलाइन बुक कर दिया गया। बहु ने गर्म कपड़े,दवाइयाँ, स्वेटर सब पैक कर दिया था।

देर रात कुछ खट-पट की आवाज़ श्रीमती जी को सुनाई दी। पूछा, “क्या कर रहे हैं?”
“कुछ नहीं। तुम सो जाओ न। सुबह निकलना है।” कह कर पता नहीं बैग में क्या-क्या भरते रहे।
सुबह बेटे-बहू हिदायत के साथ ट्रेन में बिठा आये।

ट्रेन चल पड़ी थी अब। साइड की चेयर सीट पर दोनों आमने-सामने की सीट पर बैठे हुए थे। परदे धीरे-धीरे हिल रहे थे। हिलने के बीच में से गुज़रता हुआ हर कोई आधा-आधा दिख रहा था।

जितनी बार चाय आती तो पूछते, “चाय पीओगी?” एकाध बार उन्होंने पीया बाद में इनको भी पीने से मना कर दिया बोलीं, “और पीयेंगे तो एसिडिटी हो जाएगी।”

शाम ढलने लगी थी। बहु ने खाना पैक करके दिया था। दोनों ने साथ में खाया। जब वो कुल्ला करने गयी तो कुर्सियां खोल कर बिस्तर लगा लिया दोनों के लिए। थोड़ी देर तक बतियाने के बाद वो सो गयी।

कोई आधी रात रही होगी। ट्रेन की खिड़की से पूरा चाँद झाँक रहा था। शायद गँगा नदी आने वाली थी। दोनों तरफ़ खुले मैदान और सोते हुए पेड़ दिख रहे थे। अपनी सीट से उतर कर धीरे से उनको जगाया। वो थोड़ी सरप्राइज़ होते हुए उठ बैठी,
“कुछ चाहिए क्या?”
“नहीं। ज़रा दरवाजे तक चलोगी।”
“क्यों?”
“बस चलो न।”
कह कर चप्पल उनके पैरों में पहना दिया। उन्हें झुकने में तकलीफ़ जो होती थी।

धीरे-धीरे चलते हुए दोनों ट्रेन के दरवाज़े तक पहुँच गए। टीटी सो रहा था। दरवाजा बंद था। एक लाइट जलते-जलते बुझ रही थी।

हौले से दरवाज़े को खोला और खोल कर बीच में खड़े हो गए। उनको कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर वो करना क्या चाहते हैं? वो सीट से टिक कर अब भी खड़ी थी।

जब वो अपनी जगह पर स्थिर से खड़े हो गए तो हाथ पकड़ कर उनको अपने सामने ले आएं। वो अब भी खोयी हुई सी खड़ी थी। गेट से आती ठंडी हवा उनके चेहरे को छू रही थी। बाल पीछे की तरफ उड़ रहे थे। चाँद की जितनी रौशनी उनके चेहरे उतर रही थी, उसमें उनका सिंदूर चमक रहा था। नाक पर भी सिंदूर के कुछ कतरे बिखरें हुए थे।

शॉल को ठीक से ओढ़ने के लिए उन्होंने अपने दोनों हाथ फैलाये तो उन्होंने उनको थोड़ा नज़दीक लेते हुए बाँहों में भर लिया। कुछ समझ पाती इसके पहले उनके होंठ इनके होंठो पर थे। उस पल में सारी क़ायनात की हया इनके चेहरे पर उतर आयी थी।

ट्रेन अपनी रफ़्तार से गँगा जी के ऊपर से गुज़र रही थी। उन गुज़रते पलों में वो दुल्हन की तरह शर्मा कर उनके काँधे पर सिर टिकाये खड़ी थी और वो कान में फुसफुसा कर कह रहे थे,

“याद है तुम्हें जानाँ जब हमारी बातें शुरू हुई थी तो एक रात तुमने ज़िक्र किया था कि तुम्हें चलती ट्रेन में कोई चूमें। ज़िंदगी की भाग-दौड़ में तुम्हारी कही बातों को जी नहीं पाया। अब एक-एक करके उनको जीऊंगा। तुम्हें लेकर। तुम्हारे साथ। ये आगाज़ है एक नए सफ़र का।”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here